आलोचना का अर्थ, परिभाषा, स्वरूप और प्रकार | alochana ka arth, paribhasha, swarup aur prakar

 

आलोचना का अर्थ, परिभाषा, स्वरूप और प्रकार | alochana ka arth, paribhasha, swarup aur prakar 


आलोचना का अर्थ

 आलोचना शब्द का प्रयोग किसी कृति के गुण-दोषों के विवेचन के लिए किया जाता है। सामान्यतः आलोचना का अर्थ लोग दोषदर्शन से ही लेते हैं, किन्तु आलोचना के व्युत्पत्तिपरक अर्थ पर विचार करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि आलोचना का अभिप्राय गुण-दोष दोनों पर प्रकाश डालना है। आलोचना को समालोचना अथवा समीक्षा भी कहते हैं।

 

व्युत्पत्तिपरक अर्थ - आलोचना शब्द की व्युत्पत्ति लोचधातु में अन्प्रत्यय लगाकर और उपसर्ग जोड़ने से होती है जिसे स्त्रीलिंग बनाने के लिए पुनः प्रत्यय जोड़ दिया जाता है। इसकी व्युत्पत्ति निम्न प्रकार की हुई है :

 

आ समन्तात् लोचनम् अवलोकनम् इति

आलोचनं स्त्रियां आलोचना।

 

         का अर्थ है चारों ओर और लोचन का अर्थ है देखना। अतः आलोचना का शाब्दिक अर्थ हुआ - सब ओर देखना।

         दूसरे शब्दों में किसी साहित्यिक रचना की सम्यक् परीक्षा करना, उसके गुण-दोषों का उद्घाटन करना, आलोचना है।

          अंग्रेजी में आलोचना का पर्यायवाची शब्द ‘Criticism’ (क्रिटीसिज्म) है जो मूलतः ‘Krites’ (क्रिटेस) धातु से बना है जिसका अर्थ है अलग करना अर्थात् जिसमें गुण-दोष दोनों को अलग-अलग करके दिखाया गया हो उसे आलोचना कहते हैं।

आलोचना की परिभाषा

 

         आलोचना के स्वरूप को स्पष्ट करने के लिए यहाँ हम कुछ विद्वानों द्वारा दी गई परिभाषाओं को प्रस्तुत कर रहे हैं :

 

(1) ड्राइडन - आलोचना वह कसौटी है जिसकी सहायता से किसी रचना का मूल्यांकन किया जाता है। वह उन विशेषताओं का लेखा-जोखा प्रस्तुत करती है जो साधारणतः किसी पाठक को आनन्द प्रदान करती हैं।

 

स्पष्ट है कि इस परिभाषा में आलोचना के दो उद्देश्य बताए गए हैं :

1. कृति के मूल्यांकन के लिए मापदण्ड निर्धारित करना।

2. कृति की विशेषताओं को उजागर करना।

 

(2) कार्लायल - किसी साहित्यिक कृति का व्यक्ति के मन पर जो प्रभाव पड़ता है उसे व्यक्त करना ही आलोचना है।

 

     इस परिभाषा में आलोचना के प्रभाववादी स्वरूप को व्यक्त किया गया है। पाठक के मन पर जो अच्छे या बुरे प्रभाव किसी कृति को पढ़कर पड़ते हैं उन्हें व्यक्त करना ही आलोचना है।

          इस प्रकार की आलोचना प्रामाणिक नहीं कही जा सकती, क्योंकि एक ही कृति किसी पाठक को अच्छी लग सकती है और किसी अन्य को सामान्य सी प्रतीत होती है।

 

(3) आई. ए. रिचईस  - आलोचना के रूप में कोई स्थापना करना वास्तव में मूल्यों के न्यायाधीश के रूप में स्थापना करना है।

         वे काव्य का मूल्यांकन मनोवैज्ञानिक और नैतिक आधारों पर करने के पक्षपाती थे।

 

(4) हडसन - समीक्षा के द्वारा पाठक रचयिता की विशाल चित्तभूमि का भागीदार बन जाता है।

     इस परिभाषा से स्पष्ट है कि पाठक के लिए आलोचना का विशेष महत्व है। आलोचना वह सेतु है जो पाठक और रचयिता के हृदय को जोड़ देती है।

 

(5) आचार्य श्यामसुन्दर दास के अनुसार - यदि साहित्य को जीवन की व्याख्या मानें तो आलोचना को उस व्याख्या की व्याख्या मानना पड़ेगा।

     इस परिभाषा में व्याख्यात्मक आलोचना पर बल दिया गया है। आलोचक निष्पक्ष होकर किसी कृति के विषय में यह व्याख्या करता है कि उसमें जीवन के विषय में क्या बात कही गई है।

 

आलोचना का स्वरूप

         उपर्युक्त परिभाषाओं के आलोक में आलोचना के स्वरूप और कार्य के विषय में निम्नलिखित तथ्यों का उद्घाटन होता है :

1. आलोचना किसी रचना के गुण-दोषों का उद्घाटन करती है।

 

2. आलोचना के द्वारा रचना का मूल्यांकन किया जाता है।


3. आलोचना के द्वारा रचना की व्याख्या की जाती है और मन पर पड़े प्रभावों को व्यक्त किया जाता है।


4. आलोचना रचना का भावन या शंसन करके कृतिकार के उद्देश्य को स्पष्ट करती है।

 

आलोचना के भेद

     आलोचना की विभिन्न पद्धतियों के आधार पर उसके अनेक भेद बताए गए हैं। यहाँ हम कुछ प्रमुख भेदों की चर्चा कर रहे हैं:

 

(1) शास्त्रीय आलोचना - इस आलोचना के अन्तर्गत आलोचक काव्यशास्त्र के नियमों को आधार बनाकर मूल्यांकन करता है। आलोचना की इस प्रणाली में आलोचक न तो व्याख्या करता है और न ही अपने मन पर पड़े प्रभावों को प्रस्तुत करता है। वह व्यक्तिगत रुचि को भी कृति के मूल्यांकन का आधार नहीं बनाता अपितु काव्यशास्त्र के सिद्धान्त की कसौटी पर किसी कृति की जांच परख करता है।


(2) निर्णयात्मक आलोचना - इस आलोचना पद्धति में आलोचक एक न्यायाधीश की भांति आलोच्य कृति के विषय में अपना निर्णय देता है। निर्णय के विषय में वह कभी तो शास्त्रीय सिद्धान्तों को आधार बनाता है तो कभी व्यक्तिगत रुचि को। कभी लोकहित की दृष्टि से वह कृति का मूल्यांकन कर वह उसे शत या अशत घोषित करता है और कभी कृति की परीक्षा नवीन सिद्धान्तों के आधार पर करके अपना निर्णय देता है। वह कृतियों को सुन्दर, असुन्दर, उत्तम-मध्यम, अधम, आदि श्रेणियों में वर्गीकृत कर साहित्य में उसका स्थान निर्धारित करता है।


         कुछ विद्वानों ने इस आलोचना पद्धति का खण्डन किया है। उनका तर्क है कि आलोचक का कार्य कृति की व्याख्या कर उसके सौन्दर्य का उद्घाटन करना है जिससे सामान्य पाठकों कर उस कृति का अध्ययन करने में सहायता मिल सके, न्यायाधीश की भांति निर्णय करना आलोचक का धर्म नहीं है। हिंदी में आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी की आलोचना निर्णयात्मक आलोचना कही जाती है।

 

     बाबू गुलाबराय जी ने कहा है कि यदि निर्णय शास्त्रीय सिद्धान्तों के आधार पर किया गया हो तब तो उचित है अन्यथा व्यक्तिगत रुचि-अरुचि के आधार पर किया गया निर्णय युक्ति-संगत नहीं हो सकता।

 

(3) व्याख्यात्मक आलोचना - शास्त्रीय नियमों से मुक्त होकर कृति की व्याख्या करने का प्रयास ही व्याख्यात्मक आलोचना है। रूढ़िवादी आलोचकों के द्वारा बनाए गए नियमों के आधार पर जो आलोचना होती है उसमें कृति के सौन्दर्य का उद्घाटन नहीं हो पाता अतः कृति का वास्तविक मूल्यांकन नहीं हो सकता।

 

         व्याख्यात्मक आलोचना में आलोचक व्यक्तिगत रुचि-अरुचि को एक ओर रखकर निरपेक्ष दृष्टि से किसी कृति की व्याख्या करता है जिसमें वह इतिहास, तत्कालीन परिस्थितियों, प्रतिपाद्य विषय और प्रतिपाद्य शैली, आदि का विश्लेषण करता है। एक युग के नियम दूसरे युग में खरे नहीं उतर सकते इसलिए इस प्रणाली से आलोचना करने वाले आलोचक को अपने मानदण्ड लचीले बनाने पड़ते हैं।

 

         व्याख्यात्मक आलोचना प्रारम्भ करने का श्रेय डॉ. मुल्टन को है। कार्लायल और मैथ्यू आर्नोल्ड ने भी व्याख्यात्मक आलोचना को लोकप्रिय बनाया। हिंदी में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने व्याख्यात्मक आलोचना का सूत्रपात किया। उन्होंने तुलसी, सूर और जायसी की आलोचना में व्याख्यात्मक आलोचना पद्धति का आश्रय लिया है।

 

(4) सैद्धान्तिक आलोचना - साहित्यिक रचना से संबंधित आधारभूत सिद्धान्तों का निर्माण इस आलोचना पद्धति के द्वारा किया जाता है। रीति ग्रन्थ या लक्षण ग्रन्थ सैद्धान्तिक आलोचना के ग्रन्थ हैं।


         आलोचक अपनी प्रतिभा के आधार पर तथा प्राचीन पद्धति ग्रन्थों के आधार पर काव्य रचना संबंधी मूलभूत सिद्धान्तों का निर्माण करता है और उसी के आधार पर किसी कृति की आलोचना करता है।


         सैद्धान्तिक आलोचना एक प्रकार से शास्त्रीय पक्ष है। सिद्धान्त निर्माण करने वाले आलोचक को केवल परम्परा से प्राप्त सिद्धान्तों के चक्कर में ही नहीं पड़ना चाहिए अपितु उसे नवीन सिद्धान्तों का निर्माण नए आधार पर करना चाहिए।


          संस्कृत में सैद्धान्तिक आलोचना पर्याप्त विकसित थी। भरत मुनि का नाट्यशास्त्र, मम्मट का काव्यप्रकाश, विश्वनाथ का साहित्य-दर्पण, आनन्दवर्द्धन का कान्यालोकआदि ऐसे ग्रन्थ हैं।


         हिंदी में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का रस मीमांसा, डॉ. नगेन्द्र का रस सिद्धान्त, बाबू गुलाबराय का काव्य के रूप, भगीरथ मिश्र का भारतीय काव्यशास्त्रसैद्धान्तिक आलोचना के प्रमुख ग्रन्थ माने जा सकते हैं।


 
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(5) ऐतिहासिक आलोचना - साहित्यकार की रचना अपने युग से प्रभावित होती है। अतः ऐतिहासिक आलोचना समीक्षा की वह पद्धति है जिसमें कोई आलोचक तत्कालीन परिस्थितियों का विश्लेषण कर उनकी पृष्ठभूमि में किसी लेखक की रचनाओं की परीक्षा करता है।


      उदाहरण के लिए, राम काव्य की रचना वाल्मीकि, तुलसीदास और मैथिलीशरण गुप्त ने की है, किन्तु उनकी कृतियों में आधारभूत मौलिक अन्तर है जो तद्युगीन परिस्थितियों की उपज है। जब तक युगीन इतिहास को समझा नहीं जाता तब तक उसे स्पष्ट नहीं किया जा सकता।


     आधुनिक युग में ऐतिहासिक आलोचना का पर्याप्त विकास हुआ है। समालोचना की इस पद्धति ने समीक्षा को एक नई दिशा दी है। अन्य प्रणालियों के आलोचक भी किसी-न-किसी रूप में ऐतिहासिक आलोचना का आधार ग्रहण करने लगे हैं।


      हिंदी साहित्य के इतिहास ग्रन्थों की रचना इसी प्रणाली पर की गई है। इस आलोचना पद्धति में केवल एक ही त्रुटि है और वह यह कि इसमें युगीन परिस्थितियों के विश्लेषण को इतना अधिक विस्तार मिल जाता है कि कवि और उसकी कृतियों की उपेक्षा हो जाती है।

 

(6) मनोवैज्ञानिक आलोचना - मनोवैज्ञानिक आलोचना का अभिप्राय है मनोविज्ञान के परिप्रेक्ष्य में किसी कृति की समीक्षा करना। फ्रायड के अनुसार, कला का जन्म वासना से होता है। हमारी कुण्ठाएं और अतृप्त वासनाएं जो अवचेतन में पड़ी रहती हैं; जाने-अनजाने कला या स्वप्न के माध्यम से व्यक्त हो जाती हैं।  अतः हमें किसी साहित्यिक कृतिकार के अन्तर्मन और स्वभाव का मनोविश्लेषण करना चाहिए।


      यह आलोचना पद्धति साहित्य को सामाजिक कर्म न मानकर वैयक्तिक कर्म मानती है और कवि के आन्तरिक व्यक्तित्व के संबंध में कृति का विश्लेषण और भावन करती है।

 

     मनोवैज्ञानिक आलोचना में मनोविश्लेषण के आधार पर रचना की केवल परीक्षा नहीं होती अपितु रचनाकार की मानसिक स्थितियों का विश्लेषण और उसके व्यक्तित्व का अध्ययन भी होता है। वस्तुतः इस प्रणाली में काव्य रचना की प्रक्रिया का विश्लेषण किया जाता है।


     इस आलोचना पद्धति में सबसे बड़ा दोष यह है कि वह साहित्य को कुण्ठाजनित मानती है, किन्तु यह आवश्यक नहीं है। सच्चा कवि तो अपने हृदय को लोक हृदय में लीन कर देता है अतः यह कहना तर्कसंगत होगा कि इस आलोचना पद्धति से निकाले गए निष्कर्ष भ्रामक हैं।

 

(7) प्रभाववादी आलोचना - इस आलोचना पद्धति में आलोचक कृति का विश्लेषण या विवेचन नहीं करता, केवल अपने मन पर पड़ी प्रभाव तरंगों को व्यक्त करता है। आलोचक अपने हृदय पर पड़े हुए प्रभावों से बच ही नहीं सकता अतः तटस्थ होकर आलोचना करना यदि असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है।

 

हडसन प्रभाववादी आलोचना को विशेष महत्व देते हुए कहते हैं :

 

वास्तव में हम किसी कृति के संबंध में अपने विचार ही व्यक्त करते हैं अर्थात् अपने मन पर पड़े प्रभावों को ही सामने रखते हैं।


         प्रभाववादी आलोचना में सबसे बड़ा दोष यह है कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी रुचि-भिन्नता के कारण एक ही रचना के बारे में अलग-अलग राय व्यक्त करता है इसलिए आलोचना में प्रामाणिकता नहीं रहती। ऐसा लगता है कि आलोचक अपनी रुचि को पाठकों पर थोपने का प्रयास कर रहा है।


         प्रभाववादी आलोचना तभी उपादेय बन सकती है जब उस पर कुछ नियन्त्रण लगा दिए जाएं। व्यक्तिगत रुचि के आधार पर किसी कृति की निन्दा अथवा प्रशंसा से बचते हुए रचना के मार्मिक और प्रभावशाली पक्ष का उद्घाटन करना ही सच्ची प्रभाववादी आलोचना है। हिंदी में श्री शान्तिप्रिय द्विवेदी इसी कोटि के आलोचक हैं।

 

(8) प्रगतिवादी आलोचना - इस आलोचना पद्धति के जनक मैक्सिम गोर्की हैं। इस आलोचना का आधार समाजवादी यथार्थ है। वर्ग संघर्ष की पृष्ठभूमि में किसी कृति की परीक्षा या आलोचना करना प्रगतिवादी आलोचना है।


          इसके अनुसार जो कृति शोषण का विरोध करती है, जन सामान्य के लिए हितकर है और मार्क्सवादी सिद्धान्तों का प्रचार करती है; वह उतनी ही श्रेष्ठ कृति है।

          इस प्रकार प्रगतिवादी आलोचना में साहित्य की सामाजिक उपयोगिता को ही एकमात्र मापदण्ड बनाया गया है। निश्चय ही यह दृष्टि एकांगी है और काव्य के मान्य सिद्धान्तों की उपेक्षा करने वाली है। शिवदान सिंह चौहान, नामवर सिंह, डॉ. रामविलास शर्मा, प्रकाश चन्द गुप्त आदि प्रगतिवादी आलोचक हैं।

 

(9) तुलनात्मक आलोचना - तुलनात्मक आलोचना का प्रारम्भ उन्नीसवीं शताब्दी से हुआ। इसका क्षेत्र बहुत व्यापक है और यह कई प्रकार की हो सकती है जैसे :

 

1. दो काव्य प्रवृत्तियों की तुलना ।

2. एक ही युग के दो कवियों की तुलना।

3. विभिन्न युगों के कवियों की तुलना।

4. अलग-अलग भाषाओं के दो कवियों की तुलना।

5. एक ही कवि की दो कृतियों की तुलना।


     तुलनात्मक आलोचना में बहुत सावधान रहना चाहिए। तुलना करने के लिए समान आधारों की खोज करनी चाहिए तभी तुलना सार्थक होगी।


     तुलना में भी विवेचन और विश्लेषण ही करना चाहिए निर्णय देना उचित नहीं है। हिंदी में इस वर्ग के आलोचक हैं लाला भगवानदीन और पद्मसिंह शर्मा।

 

 

आलोचना की उपयोगिता और उद्देश्य

आलोचना के उद्देश्य पर हम तीन दृष्टियों से विचार कर सकते हैं :

(1) कवि की दृष्टि से

(2) पाठक या श्रोता की दृष्टि से

(3) मूल्यांकन की दृष्टि से

 

(1) कवि की दृष्टि से - कवि को दृष्टि में रखकर जब हम आलोचना के उद्देश्य पर विचार करते हैं तो निम्न तथ्य सामने आते हैं:

() आलोचना किसी कवि की रचना के गुण-दोषों का उद्घाटन करती है जिसे जानकर कवि सजग हो जाता है और अपनी अगली रचना में उन दोषों का समावेश करने से बचता है।

() आलोचना के माध्यम से काव्य में निहित गुणों की विस्तृत चर्चा की जाती है, इससे कवि को सत्काव्य निर्माण की प्रेरणा मिलती है। काव्य का सच्चा मर्मज्ञ आलोचक ही होता है, वह कवि के अन्तर्मन में प्रवेश कर मार्मिक अनुभूतियों का उद्घाटन करता है। जैसे वायु चन्दन की सुगन्ध को वातावरण में फैला देती है उसी प्रकार आलोचक अपनी आलोचना से कवि के यश का प्रसार करता है।

 

(2) पाठक या श्रोता की दृष्टि से - पाठक या श्रोता की दृष्टि से आलोचना की विशेष उपादेयता है, क्योंकि:

() सामान्य पाठक काव्य के मर्म से परिचित नहीं होता । आलोचक अपनी प्रतिभा के बल पर कृति की व्याख्या करता है और मार्मिक तथ्यों का उद्घाटन कर पाठक को कवि की कृति से भली-भांति परिचित कराता है। इस प्रकार कवि और पाठक के बीच में आलोचक मध्यस्थ बनता है।

() आलोचना पाठक की रुचि का परिष्कार करती है।  क्या अच्छा है, क्या बुरा इसकी जितनी समझ आलोचक को होती है उतनी पाठक को नहीं।

() आलोचक साधारण पाठक की अपेक्षा अधिक ज्ञान सम्पन्न होता है, उसका अध्ययन विस्तृत और गम्भीर होता है, वह रचना के विभिन्न पक्षों पर प्रकाश डालकर हमें अनेक नई बातें बताता है और नए मार्ग दिखाता है।

     आचार्य श्यामसुन्दर दास के अनुसार, आलोचना से हम बहुत लाभ उठा सकते हैं और हमारा ज्ञान बहुत बढ़ सकता है।

 

(3) मूल्यांकन की दृष्टि से - मूल्यांकन की दृष्टि से भी आलोचना का विशेष महत्व है । आलोचक किसी रचना की व्याख्या ही नहीं करता अपितु उसका मूल्यांकन भी करता है। आलोचक के निर्णय को व्यक्तिगत निर्णय कहकर उपेक्षित नहीं किया जा सकता।

      यद्यपि आलोचक एक व्यक्ति ही है फिर भी कृति का मूल्यांकन व्यापक मानवीय प्रक्रिया का अंग है। विभिन्न मनुष्यों के विचारों और भावों में बुनियादी समानताएं भी दिखाई पड़ती हैं, इसीलिए मूल्यांकन में भी समानता मिल सकती है। ताजमहल को असुन्दर कहने वाले अपवाद ही माने जाएंगे।


निष्कर्ष 


     आलोचना की सामाजिक उपयोगिता निर्विवाद है। यद्यपि साहित्यिक कृति का मूल्यांकन साहित्यशास्त्र में सिद्धान्तों की कसौटी पर होता है तथापि आलोचना कृति के नैतिक पक्ष पर भी विचार करती है। साहित्य का संबंध जीवन से है, इसलिए जो जीवन के लिए अच्छा नहीं है, वह साहित्य में भी अच्छा नहीं कहा जा सकता। इस प्रकार आलोचना अशिष्ट, अनैतिक एवं अश्लील साहित्य पर रोक लगाती है।


     तटस्थ, आलोचक नीर-क्षीर विवेक से युक्त एक निष्पक्ष व्यक्ति होता है और वह स्वस्थ आलोचना द्वारा कवि एवं पाठक दोनों का उपकार करता है।

 

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